किसी जीव को पीड़ा देना पाप है और किसी जीव को प्रसन्नता देना पुण्य है।
इस प्रकार की कल्याणकारी सूचना से स्वयं के मन में आनंदकारी व संतोषपूर्ण भाव पैदा होता है।

यही भाव कल्याण की राह पर ले जाता है, क्योंकि एक संतुष्ट मन ही आनंद की ओर उन्मुख होता है।
जबकि एक असंतुष्ट मन दुखों को या दुख के भाव को स्वयं की ओर आकर्षित करता है।

इसलिए हे मनुष्य, इस पाप-पुण्य, सुख-दुख के भाव से स्वयं को दूर रखते हुए,
आनंदमयी संतोष के साथ स्वयं को जोड़ और अपने कल्याण की राह पर आगे बढ़।

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